ज़िंदगी है क्या

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ज़िंदगी है क्या
कुछ पता नहीं

क्यों चल रहे
कुछ पता नहीं

कहाँ पहुँचेंगे
कुछ पता नहीं

मंज़िल है किधर
कुछ पता नहीं

कौन अपना कौन पराया
कुछ पता नहीं

छाया मिलेगी कहाँ
कुछ पता नहीं

क्यूँ है तपन
कुछ पता नहीं

क्या है चाहत
कुछ पता नहीं

क्यूँ है अंधेरा
कुछ पता नहीं

कहीं है उजाला
कुछ पता नहीं

क्यूँ हैं रंग धुंधले
कुछ पता नहीं

क्यूँ हैं अकेले
कुछ पता नहीं

कहाँ है सहारा
कुछ पता नहीं

क्यूँ फैला धुआँ
कुछ पता नहीं

कितनी हैं साँसें
कुछ पता नहीं

क्या होना हासिल
कुछ पता नहीं

कहाँ तलाशूँ खुद को
कुछ पता नहीं

कहाँ जाते रास्ते
कुछ पता नहीं

पूनम सिंह

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मैं कौन हूँ

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मैं कौन हूँ

एक औरत
जी रही सदा
साए में
सदियों से बंधी
बेड़ियों में
बेड़ियाँ भी अनगिनत
प्यार की
कभी दुलार की
ममता की
कभी हया की
समाज की
कभी रीतियों की
कुरीतियों की
तोड़ना है इन्हें
होना आज़ाद
नील गगन में
भरनी उड़ान
बहती पवन में
चढ़ना परवान
चाहती हूँ पाना
मेरा आसमान

पूनम सिंह

आओ तुम ऐसे

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आओ तुम ऐसे 

आओ तुम ऐसे मेरे आँगन में
बरसें फुहार जैसे सावन में
सजा दूं मैं झूले आँगन में
बढाएँ प्यार की पींघ सावन में

कितने दिनों से था तुम्हारा इंतजार
छुपी थी तुम जाने किस आँगन में
आकर संवार दो मेरा ये संसार
खिला दो प्यार के फूल आँगन में

ये दिवारें रही थीं तुम्हें पुकार
पहुँच न सकी तुम तक इनकी गुहार
नाज़ुक हाथों से अब दो इन्हें संवार
और दे दो एक नया आकार

बजेगी जब तुम्हारी पायल छन-छन
भर देगी सरगम से हर कण-कण
तुम्हारे हाथों की चूड़ियों की खनक
जगाएगी मुझमें प्यार की एक अलख

जब आओगी तो जी भर के जीयेंगे
खुशियाँ ढेरों दामन में भर लेंगे
समझेंगे मिलकर रिश्तों की नई भाषा
जगाएँगे अपनों में एक नई आशा

आओ तुम ऐसे मेरे आँगन में
बरसे फुहार जैसे सावन में
सजा दूं मैं झूले आँगन में
बढाएँ प्यार की पींघ सावन में

पूनम सिंह

फिरोज़पुर

फिरोज़पुर की फिज़ाओं में
रचता, बसता, रमता पंजाब
वीर शहीदों ने इसकी माटी में
अपने लहू से खिलाए गुलाब

भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव
सोए हैं इसकी गोद में
हुसैनीवाला का नाम
दर्ज करा गए इतिहास में

इसके कूचे,चौबारे,मौहल्ले
समेटे हैं जाने कितनी यादें
मिट्टी के कण-कण में समाया
इसके वीरों ने जो रक्त बहाया

आज़ादी का यहाँ जश्न मना
विभाजन का इसने दंश सहा
फिर भी न तड़पा न रोया
ठहर गया बस जैसे है सोया

पैंसठ, इक्कत्तर का तूफ़ान झेला इसने
कितनी बार टूटे, बिखरे इसके सपने
समेटकर,संजोकर अपनी यादें
खड़ा है, डटा है, सीना ताने

बंट गए लोग, बंट गई ज़मीं
बंट गए खेत, बंट गई माटी
बांट सका कौन इसकी हवा सुहानी
बांट सका कौन सतलुज की रवानी

पूनम सिंह

 

नया अफसाना

साथ-साथ चलते
हुआ क्या
अलग हुए रास्ते
वादा था
ना होंगे जुदा
फिर क्यूँ
रह गए अकेले
पाया क्या
समझें ना तुम
ना हम
बेवफा ना तुम
ना हम
बादल भी छाए
बरसात आई
भीगे ना तुम
ना हम
आया एक झोंका
और आँधी
बिखर गए सपने
हुए पराए
कसूर हवाओं का
हालातों का

समझें ना तुम
ना हम
चल पडा अकेला
जाना कहाँ
दिखती नहीं मंज़िल
ना ठिकाना
रूठी मेरी दुनिया
बेसुध ज़माना
खोजना है फिर
नया आशियाना
लिखना है फिर
नया अफसाना

पूनम सिंह

मेरी यादों का सफर

मेरी यादों का सफर
कुछ खट्टा, कुछ मीठा

कुछ दिन के उजाले सा उजला
कुछ रात की स्याही सा काला

कुछ समंदर की गहराई सा गहरा
कुछ बादल की उड़ान सा ऊँचा

कुछ हवाओं सा बहता
कुछ धरती सा ठहरा

कुछ फूलों सा महकता
कुछ काँटों सा चुभता

मेरी यादों का सफर
कुछ खट्टा, कुछ मीठा

मेरी यादों का सफर
कभी हँसाता, कभी रूलाता

कभी दुखों के सागर में डूबा
कभी सुखों के रंगों से सजा

कभी वीरानों सा सुनसान
कभी महानगरी सा उदयमान

कभी बरखा सा बरसता
कभी सूखे सा डराता

कभी कटी पतंग सा आवारा
कभी चाँद-चकोर सा बेचारा

मेरी यादों का सफर
कुछ खट्टा, कुछ मीठा

मेरी यादों का सफर
कभी हँसाता, कभी रूलाता

पूनम सिंह

साथ तुम्हारा

साथ तुम्हारा

जब से मिला है साथ तुम्हारा
लम्हा- लम्हा मैं जीने लगा हूँ

जब से मिला है तेरी जुल्फों का साया
लम्हा- लम्हा मैं चुराने लगा हूँ

जब से मिला है तेरी खुशबू का झोंका
लम्हा- लम्हा मैं महकने लगा हूँ

जब से मिला है तेरी आँखों का जाम
लम्हा- लम्हा मैं बहकने लगा हूँ

जब से मिला है तेरे अधरों का स्पर्श
लम्हा लम्हा मैं सँवरने लगा हूँ

जब से मिला है तेरा बाँहों का घेरा
लम्हा- लम्हा मैं पिघलने लगा हूँ

जब से मिला है तेरे ख्वाबों का तोहफा
लम्हा- लम्हा मैं सजाने लगा हूँ

जब से चला है तुम्हारी अदाओं का जादू
लम्हा- लम्हा मैं शायर होने लगा हूँ

पूनम सिंह

आना और जाना

आना और जाना
आना और जाना
मिलना और बिछुड़ना
तो एक बहाना है
हम भी सफर पर
तुम भी सफर पर
मंजिल तो अभी पाना है
आज हम हैं
कल कोई और होगा
सिलसिला यह पुराना है
बहुत देख लिया
बहाव के साथ बह कर
पानी में रास्ता अभी बनाना है
सुबह की खुमारी देख ली
दुपहरी का मज़ा ले रहे
शाम का तराना अभी सुनाना है
क्या खोया,क्या पाया
क्या छूटा,क्या हाथ आया
क्यूँ रखें हिसाब
बहुत कुछ अभी सीखना
और सीखाना है
चल पड़े जिस डगर पर
क्यूँ सोचें क्या होना आगे
अभी बस
इसी पल को सजाना है

टूटा सपना

टूटा सपना

 

उगता सूरज
चमकता चाँद
लहराते खेत
खिलती कली
चहकती कोयल
कूदती हिरणी
उन्मुक्त ज़िंदगी
माँ का आँचल
बाबूजी का दुलार
सखियों की प्रीत
कानों में संगीत
सपने सुनहरे
बेगाने भी अपने
कुछ करने की चाह
कुछ पाने को राह

फिर अचानक एक दिन …

सुलगती चिंगारी
धधकता ज्वालामुखी
उफनता सागर
मचलता भंवर
दहाड़ती नदी
विनाशकारी बाढ़

अनगिनत बढ़ते हाथ …

उजड़ती बगिया
टूटा सपना
उजड़ा बाग
भयानक चक्रवात
प्रचंड तूफान
बंजर धरा
सूखा पेड़
मृत शरीर

पूनम सिंह

आओ तुम

आओ तुम

आओ तुम …

और छा जाओ तुम
मेरे अस्तित्व पर

भीगो दो तुम
मेरे जज्बातों को

महका दो तुम
मेरी साँसों को

सहला दो तुम
मेरे एहसासों को

पंख लगा दो तुम
मेरे अरमानों को

सजा दो तुम
मेरे ख्वाबों को

समा जाओ तुम
मेरी सोच में

जगा दो तुम
मेरी चाहतों को

चुरा लो तुम
मेरे लम्हों को