मैं कश्मीर हूँ

मैं कश्मीर हूँ

मैं कश्मीर हूँ
सब कहते हैं
हिंदुस्तान का ताज हूँ

ताज यह
न जाने
कितनी बार उजड़ा
कितनी बार बसा
इतने सालों में भी
थमा नहीं
उजड़ने- बसने का सिलसिला

कभी उजड़ा
इंसान के हाथों
बहा खून
न जाने
कितने मासूमों का
कभी लुट गया
परदेसियों के हाथों
कभी अपने ही
सरफिरों के हाथों

उजड़ गया कभी
प्रकृति के हाथों
प्रलयंकारी बाढ़ में
बह गए कभी
भूकंप में
ढह गए कभी
मेरे सारे सपने
और अपने

क्या कसूर था मेरा
बिछुड़ गए
खदेड़े गए
कितने मेरे अपने
मैं देखता रहा
एक पत्थर सा
जड़वत
लुटा मैं
सजा भी मिली
मुझे ही

न जाने
कितने और
देने होंगे इम्तिहान
मुझ ज़मीनी जन्नत को
उजड़ने-बसने के सिलसिले से
पाना चाहता हूँ निजात
चाहता हूँ रचना
एक नया इतिहास ।

पूनम सिंह

Advertisements

प्रहरी के नाम

प्रहरी के नाम

सीमा पर खड़ा प्रहरी
रात, सुबह और दुपहरी
डटा जैसे अटल चट्टान
छूने को है आसमान

यादों के भँवर में घिर जाता
जज्बातों की लहरों में गोते लगाता
घर-बार,यार-दोस्त,बीवी-बच्चे
कर्म-प्रतिज्ञा में छूटे सब पीछे

चाहा उसने कब महलों में रहना
माँगा उसने कब चाँदी और सोना
उसके हैं बहुत छोटे से सपने
भटके न ध्यान जो हो जाएँ अपने

माँ-बाप का बना रहे सहारा
पत्नी को मिल जाए हौंसला
बच्चों के सपनों को मिले उड़ान
तलाश सकें नए आसमान

भूलकर अपने सारे अरमान
खड़ा है, डटा है, सीना तान
देश-सेवा में लगा दी है जो जान
व्यर्थ न जाए यूँ ही, जीवन-बलिदान

पूनम सिंह

अनखिली कली

1549390030068_1549389997314_0_20190205_232951

अनखिली कली

बाबुल मैं हूँ तेरे आँगन का फूल

फिर समझे क्यूँ ज़माना पैरों की धूल ?

चाहता है मुझे मिटाना

मैं हूँ क्या कोई भूल?

चाहता है मुझे रौंदने

मैं हूँ क्या कोई शूल?

चाहता है मुझे दबाना

मैं हूँ क्या कोई गलत सोच?

चाहता है मुझे भूलना

मैं हूँ क्या कोई बुरा सपना?

चाहता है मुझे खत्म करना

मैं हूँ क्या बिन हाड़-माँस का पुतला ?

जाने समझेगा कब अपने आँगन की कली

सींचेगा, स॔वारेगा, दुलारेगा, संभालेग

और देगा खिलने को, थोड़ी सी ज़मीं ।

 

पूनम सिंह

ज़िन्दगी है क्या

ज़िंदगी है क्या
जीना अभी बाकी है
प्यार है क्या
एहसास अभी बाकी है
रिश्ते हैं क्या
निभाना अभी बाकी है
दोस्ती है क्या
परखना अभी बाकी है
दुख है क्या
सहना  अभी बाकी है
ऊँचाई है क्या
छूना अभी बाकी है
गहराई है क्या
नापना अभी बाकी है
जीवन है क्या
महसूस होना अभी बाकी है
मृत्यु है क्या
गले लगाना अभी बाकी है

नया साल

नया साल

लम्हा दर लम्हा
यूँ ही जुड़ता रहा
यादगार पलों से
समय का गुल्लक भरता रहा

कल आज में बदला
आज कल होता गया
समय का चक्र
यूँ ही चलता रहा

पुराना साथ
वक्त ने छीना
नया जुड़ता गया
सिलसिला यूँ ही बढता रहा

सहेज कर
संजोकर पुरानी याद
एक दूजे से मिलकर बाँटे
खुशियाँ जो लाया नया साल

20181123_215402

कौन हो तुम

कौन हो तुम
हर वक्त रहते आसपास मेरे
बचाते मुश्किलों से
हर वक्त चलते हो साथ मेरे

कौन हो तुम
देते हो जवाब मेरे हर सवाल का
हर संदेह को
मिटाते अपनी ज्ञान की रोशनी से

कौन हो तुम
जगमग करते हो मेरी दुनिया
निकाल अंधेरों से
दिखाते हो एक नया रास्ता

कौन हो तुम
महका देते हो मेरा संसार
याद करूँ जब कभी
सजा देते हो मेरा अंतर्मन
करा देते हो अपने होने का एहसास

कौन हो तुम
हटा देते हो मेरे रास्ते का रोड़ा
पकड़कर हाथ मेरा
बन जाते हो मेरे सफर का सहारा

कौन हो तुम
काँटों से भरी इस दुनिया में
खिला देते हो फूल
महका देते हो चमन खुशबुओं से

कौन हो तुम
सूखी तपती इस धरा को
देते हो नव जीवन
सींच कर अपने प्यार की बरखा से

वो तुम्हीं तो हो
पुकारू चाहे कोई नाम
वो तुम्हीं तो हो
वो तुम्हीं तो हो

पूनम सिंह

 

Deepawali celebrations are already over, but in let the spirit of Deepawali overwhelm us throughout the year…

जीवन-फुलझड़ी

दीपावली का
त्यौहार है सजा
चमकता रहे यूँ ही
घर-अंगना

दियों से रोशन
रात का आँचल
जगमग रहे यूँ ही
तन-मन

खिला-सँवरा
लगे हर चेहरा
उजला रहे यूँ ही
विचारों का गुलदस्ता

एक दिये से जलाएं
दूसरा दिया
निभाते रहें यूँ ही
साथ एक-दूजे का

खील-खिलौने, मिठाई,
नए लिबास
बढती रहे यूँ ही
ज़िन्दगी की मिठास

पटाखे की लड़ी
जोड़ते रहें कड़ी- कड़ी
पूजन में लक्ष्मी- गणपति
जीवन रहे फुलझड़ी

पूनम सिंह

आदत बन गए हो आप

आदत बन गए हो आप

आपने दिखाया
हसीन लगे नज़ारे
आपने चलाया
जाने-पहचाने लगे रास्ते
आपने समझाया
हल हुई मुश्किलें
आपने सुझाया
सुलझ गई उलझनें
आपने हंसाया
खिलखिला उठी हसरतें
आपने रोका
काबू हुई चाहतें
आदत बन गए हो आप …

पूनम सिंह

ज़िंदगी है क्या

20181013_123634.png

ज़िंदगी है क्या
कुछ पता नहीं

क्यों चल रहे
कुछ पता नहीं

कहाँ पहुँचेंगे
कुछ पता नहीं

मंज़िल है किधर
कुछ पता नहीं

कौन अपना कौन पराया
कुछ पता नहीं

छाया मिलेगी कहाँ
कुछ पता नहीं

क्यूँ है तपन
कुछ पता नहीं

क्या है चाहत
कुछ पता नहीं

क्यूँ है अंधेरा
कुछ पता नहीं

कहाँ है उजाला
कुछ पता नहीं

क्यूँ हैं रंग धुंधले
कुछ पता नहीं

क्यूँ हैं अकेले
कुछ पता नहीं

कहाँ है सहारा
कुछ पता नहीं

क्यूँ फैला धुआँ
कुछ पता नहीं

कितनी हैं साँसें
कुछ पता नहीं

क्या होना हासिल
कुछ पता नहीं

कहाँ तलाशूँ खुद को
कुछ पता नहीं

कहाँ जाते रास्ते
कुछ पता नहीं

पूनम सिंह

मैं कौन हूँ

20181006_113236

 

मैं कौन हूँ

एक औरत
जी रही सदा
साए में
सदियों से बंधी
बेड़ियों में
बेड़ियाँ भी अनगिनत
प्यार की
कभी दुलार की
ममता की
कभी हया की
समाज की
कभी रीतियों की
कुरीतियों की
तोड़ना है इन्हें
होना आज़ाद
नील गगन में
भरनी उड़ान
बहती पवन में
चढ़ना परवान
चाहती हूँ पाना
मेरा आसमान

पूनम सिंह